Friday, November 25, 2011

अपने को क्या?

संतोष तिवारी एक शिक्षक हैं, और साथ ही सामाजिक कार्यकर्ता भी, हाल के कुछ महीनों में उन्होंने अपने इलाके में एक सामाजिक लड़ाई लड़ी है. और उस संषर्ष को करीब से देख कर ही शायद उनके मन में इस कविता ने जन्म लिया होगा. वाकई हमारे देश के पिछड़ेपन का एक सबसे बड़ा कारण है इंसान का निहायत स्वार्थी स्वभाव. अपने परिवार और अपने रिश्तेदारों के अलावा इंसान किसी का भला नहीं देखना चाहता, कभी कभी अपने रिश्तेदारों का भी नहीं. और बाकी बातों से उसे कोई सरोकार नहीं होता. फिर चाहे दुनिया जीए या मरे.


छोड़ भी अब दुनिया की बातें, अपने को क्या करना है!
सुख के दिन और चैन की रातें, अपने को क्या करना है!

... मै क्यूँ सोचूँ मेरा पड़ोसी खाली पेट क्यूँ जाग रहा!
मरे कोई ले खाली आंतें, अपने को क्या करना है!

घर तू जला कर खूब उजाला कर ले जो अँधियारा हो!
मुझ को मिली ढेरों सौगातें, अपने को क्या करना है!

सुन मुफलिस उम्मीदें ना कर प्यार वफ़ा अपनेपन की!
पैसा है तो रिश्ते नाते, अपने को क्या करना है!

तंगहाली ने फिर दिल तोडा, पढी लिखी इक बिटिया का!
बिटियों की लौटें बारातें, अपने को क्या करना है!

संतोष तिवारी
२५/११/२०११

Thursday, November 17, 2011

Tagore Da!


Recently I heard a song sung by the great poet and composer Ravindranath Tagore. The song was the famous Ekla Chalo re. The moment I heard it, I was completely hooked onto it. I read and re-read it, and even learned it entirely. Then I turned to his poems. We all have read and studied Tagore in the schools and colleges, but this was something else. He had such a personality, and the amount of work he did in his life was tremendous. I wish we had more like him today. I wish we had one more Tagor da today!

Here is one of his famous poems.

Baby's World
I wish I could take a quiet corner in the heart of my baby's very
own world.
I know it has stars that talk to him, and a sky that stoops
down to his face to amuse him with its silly clouds and rainbows.
Those who make believe to be dumb, and look as if they never
could move, come creeping to his window with their stories and with
trays crowded with bright toys.
I wish I could travel by the road that crosses baby's mind,
and out beyond all bounds;
Where messengers run errands for no cause between the kingdoms
of kings of no history;
Where Reason makes kites of her laws and flies them, the Truth
sets Fact free from its fetters.

Saturday, November 12, 2011

दोस्तों की कविताओं के साथ चल रहे सफ़र की अगली मंज़ि‍ल है अनुभूति सिंह। ये हमारे कवि मित्र हिमांशु की पत्नी हैं, और एक कॉलेज में एसक्यूएल डेटाबेस की प्राध्यापिका. लेकिन कंप्यूटर जैसे विषय को पढ़ाने के बावजूद समय की रेत पर शब्दों की रंगोली बनाना इनका ख़ब्त है. और अपनी सारी व्यस्तताओं के बावजूद ये कविता के लिए समय निकाल ही लेती हैं.



बच्चों से लेकर वयस्क, सभी आज असुरक्षाओं से घिरे हैं, और ये असुरक्षा क‍वयित्री के मन में नित नए सवाल खड़े करती है।

कुछ अनसुलझे सवाल

हर दिन जब 'ककून' से घर के बाहर कदम निकलते हैं
कदम कदम पर अनसुलझे से प्रश्न उमड़ने लगते हैं.

बसते लादे बच्चों के कन्धों पर क्यों कर भार चढ़ा?
... जब हम इतने छोटे थे , क्या हमने कुछ सीखा न पढ़ा?
माना हमसे कहीं अधिक है राह कठिन इनके आगे
पर क्या बीत जाएगा बचपन बिन उछले , कूदे, भागे?

मासूम और, बिन बस्तों के , पर बिन कपड़ों , बिन सपनों के
फैलाएँ हाथ , फटकार सुनें, पर पेट भरें वो अपनों के
मुरझाए, भूखे चेहरों को भी छू जाती है कैसे हँसी?
न जाने क्या क्या उम्मीदें होंगी जीवन से इनकी भी?

भागा दौड़ी इतनी कि बस दो मिनट बचाने के ख़ातिर
क्यों तोड़ क़ायदे दौड़ लगादें पटरी पर , रोएं आख़िर.
कितने ही हादसे होते देखे , फिर भी क्यों न समझ पायें?
रफ़्तार अगर जीने की कुछ कम करें तो शायद जी पायें.

मन दूर रह रहे अपनों से खैरियत जानने को तरसे
हर पल क्यों ये दिल सहमा रहता है अनजाने से डर से?
क्यों कुछ वहशी पूरी दुनिया को धमकाएँ, देहला जाएँ?
और सब मिल कर भी इनके ज़ुल्मों से खुद को न बचा पायें

ऐसे ही बेहिसाब जवाबों की तलाश बस जारी है
या शायद इन उलझनों को सुलझाने की अपनी बारी है.

-- अनुभूति सिंह

Thursday, November 10, 2011

परिंदे का सफ़र.

पूना में पढ़े और मुंबई में कार्यरत दिल्ली के हिमांशु सिंह मेरे बहुत करीबी दोस्त हैं. ये साहब एक आईटी कंपनी में काम करते हैं. बेहद व्यस्त रहते हैं. लेकिन मेरे अनुरोध पर इन्होंने अपनी पुरानी कविता ढूंढ कर निकाली है, और वही अब यहां प्रस्तुत है.





महानगरों में रहे हिमांशु महानगरीय जीवन की आपाधापी भला कैसे भूल सकते हैं! इसी विषय को छूती है इनकी ये रचना.

मैंने परिंदे को देखा घर की तलाश में

तो लगा हर इंसान परिंदे सा

सुबह से शाम क्यों भटकते हैं ये ?
...
अनंत को तलाशते हुए आकाश के खालीपन में

शायद चित्त शांत नहीं

फिर लगा इंसान परिंदे सा

परिंदों का चुगते चुगते सचेत होना

गवाह है उनके भय का

फिर लगा इंसान परिंदे सा

संध्या बीती भोर हुई

फिर वही नित्य कर्म

एक ऊँची उड़ान

सपनो को साकार करने की आशा में

फिर लगा इंसान परिंदे सा


- हिमांशु सिंह
बीते कल की यादें समय की चादरों के नीचे जैसे गुम हो जाती हैं, लेकिन एक हवा का झोंका आता है, और उन सारी चादरों को उड़ा कर लेकर जाता है. वक्त का जो फ़ासला बन चुका था, वो मानों था ही नहीं. यही कुछ कहती है अनुराधा की ये नई कविता!



हमारी कहानी ही हमे आज, सुना रहा था कोई
फिर आग पानी में बरबस, लगा रहा था कोई!

छोड़ आये थे हम जो लम्हे, सदियों पहले
उन्हें फिर से आज जिए जा रहा था कोई!

दुनिया की भीड़ में कभी तन्हा छोड़ कर
आज क्यों सहानुभूति जता रहा था कोई!

कोई गम नहीं दशकों गुज़र गए यूंही, पर
जैसे कल का वाकया गुनगुना रहा था कोई

दुखती रगों पर हाथ न रखा करे कोई यूं
बेचैन सा उन्हें फिर समझा रहा था कोई!

क्यों उदास हो उठा यह दिल, एक बार फिर
दरिया में दर्द अपना, यूं डुबा रहा था कोई!

पीछा न छुड़ा पाए परछाइयों से चाहकर भी
उजालों से जाने क्यों मुहं चुरा रहा था कोई!

कह दिया है उनसे ना टकराएँ फिर कहीं भी
पर मिलने की दुआ, किये जा रहा था कोई!

ताउम्र ना ख़त्म हुआ, दुआओं का सिलसिला
तिल तिल कर यूं ही, जला जा रहा था कोई!

हमारे चेहरे पर मुस्कराहट देखकर वे समझे
उनको ख़यालों में अपने, बसा रहा था कोई!

Anuradha Guru

Wednesday, November 9, 2011


ये हैं मेरी एक और मित्र और हमारी नई कवियित्री अनुराधा पांडे गुरू. संजोग से ये भी नेपानगर मध्यप्रदेश की हैं. इन्होंने अंग्रेज़ी मीडियम में अपना अध्ययन किया, और कई वर्षों से पापुआ न्यू गिनी में रसायनशास्त्र की अ‍ध्यापिका हैं. लेकिन इनका शौक है हिंदी में कविताएं लिखना! है ना अचरज की बात! इनके पति भी यही मानते हैं, और वे इनकी कविताओं के मुरीद भी हैं.


अब आप भी इनकी यह कविता पढ़ें और उस पर अपनी राय दें.

फिर से मिलने के लिए बिछुड़ना ज़रूरी तो नहीं
अबके बिछुड़े तो क्या पता, फिर से मिलें ना कहीं
हर बार उसी राह से गुज़रना ज़रूरी तो नहीं
कौन जाने, इस जीवन का क्या भरोसा है कहीं!

दिल के कोने में कुछ खटकता तो होगा उसके भी,
मिलकर मुझसे, मन और भटकता तो होगा कभी!
चाह कर भी न हटे मन कहीं से तो भला क्या कीजे
रंग दुनिया के सभी .......अपने में रचा बसा लीजे

कौन जाने, इस जीवन का क्या भरोसा है कहीं!
जिंदगी तुझसे कभी हमने कुछ माँगा ही नहीं!

था बहुत भरोसा किसी को, अबके हम न बिछुड़ेंगे
क्या जानते थे तब, हम फिर दोराहों पर चल देंगे?
जुदाई से किसी की, क्यों हो कोई इस तरह दुखी
दोस्त हैं तो मिलना बिछुड़ना ही है तकदीरें सबकी

किसने जाना, जीवन का कोई भरोसा है कहीं?
जिंदगी तुझसे कभी हमने कुछ माँगा ही नहीं!

है गोल यह दुनिया, कोई अंत नहीं है इसका
हो सकता जुदाई हो, जुड़ने का दूसरा सिरा!
इस तरफ दर्द है, उस ओर भी दर्द ही होगा
किसको मिली है ख़ुशी होकर किसी से जुदा?

किसने जाना, जीवन का कोई भरोसा है कहीं?
जिंदगी तुझसे कभी हमने कुछ माँगा ही नहीं!

कई दिलों ने दिए होंगे अब तक कितने इम्तेहान
एक दिल जो हुआ अकेला तो क्यों हों यूं परेशान
बनाती है मधुर सबको, छू लेती है गहरे में कहीं
कोई हकीकत नहीं, सब समझ है अपनी अपनी

किसने जाना, जीवन का कोई भरोसा है कहीं?
जिंदगी तुझसे कभी हमने कुछ माँगा ही नहीं!
अनुराधा 14/10/2011

किसी की याद जब आती है, तो मन व्याकुल हो उठता है. यादों की पीड़ा दर्शाती संतोष तिवारी की एक और कविता:
कुछ नहीं ..... जो है ... बस उसमे सब कुछ है-

बिछड़े उस से अर्सा गुज़ारा , आँखे अब भी भर आती हैं !
साँझ ढले से उसकी यादें , अब भी मेरे घर आती हैं !

आने का ना कोई वादा , मिलने की ना आस कोई ,
फिर भी चौखट पर दो आँखें , आस का दीपक धर आती हैं !

तनहा तनहा रहता हूँ मै ,अपने आप में रहता गुम,
अब तो मेरे दिल की बातें , मुश्किल से लब पर आती हैं !

मेरी दुआ में असर भले ना हो लेकिन करता तो हूँ ,
उनमे जितनी ताकत है वो उतना काम तो कर आती हैं !

मेरे गमो पर हंसने वाले , खूब उड़ा ले आज हंसी ,
लेकिन सोच ले क्या होगा , गर मुसीबतें तुझ पर आती हैं !

- संतोष तिवारी
29/09/2011

Tuesday, November 8, 2011

दोस्तों का मंच

मित्रों ये मंच है मेरे कुछ दोस्तों का, जो कविताएं लिखने के शौकीन हैं, और कविताएं जिनका जुनून हैं! वे सब लोग अलग अलग क्षेत्रों में काम करते हैं. कुछ रसायनशास्त्र पढ़ाते हैं तो कुछ गांव गांव घूम कर लोगों को अपने बच्चों को स्कूल भेजने के लिए प्रेरित करते हैं, या फिर कुछ उच्च तकनीकी की आईटी कंपनियों में काम करते हैं. लेकिन उनमें एक बात एक समान रूप से मौजूद है. वे सभी कविताएं लिखते हैं, और बड़े शौक से लिखते हैं. अगर आप उनसे कहेंगे कि आज लंच का टाइम तो हो गया लेकिन टिफिन नहीं आया है, तो वो हमारी आपकी तरह टाइमपास नहीं करेंगे, आपने सही पहचाना, वे एकाध कविता लिख देंगे. ऐसा कविता प्रेम है उनका. ये मंच मेरे उन्हीं मित्रों को समर्पित है.



पहले कवि हैं संतोष तिवारी. मध्यप्रदेश में राजीव गांधी मिशन के असि. प्रोजेक्ट डायरेक्टर हैं और खूब व्यस्त रहते हैं. इनका एक बेटा है, और एक ही पत्नी भी. कर्म से अफ़सरशाह हैं, लेकिन मन से कवि. नेपानगर मध्यप्रदेश में हम सा‍थ साथ पढ़े, और बढ़े. कविता उनके लिए दिल की अभिव्यक्ति है.





उनकी एक कविता नोश फ़रमाइए.

कल रात,
एक अजीब से ख्वाब से,
मै डर गया, दोस्त!

तुमने
अपनी कविता में मुझे मिलने बुलाया था!
तुम्हे पाने की आस में
खंगाल ली पूरी कविता मैंने,
पर मुझे मिले नहीं तुम!

थक कर जब हताश हो रहा था मै,
तो देखा तुम्हे
दुनिया की भीड़ में ...मुस्कुराते हुए!

ख्वाब में छला है दोस्त !
सच में मत छलना,
मै सचमुच अब तक डरा हुआ हूँ!

-- संतोष तिवारी
०३/११/११