अपने को क्या?
संतोष तिवारी एक शिक्षक हैं, और साथ ही सामाजिक कार्यकर्ता भी, हाल के कुछ महीनों में उन्होंने अपने इलाके में एक सामाजिक लड़ाई लड़ी है. और उस संषर्ष को करीब से देख कर ही शायद उनके मन में इस कविता ने जन्म लिया होगा. वाकई हमारे देश के पिछड़ेपन का एक सबसे बड़ा कारण है इंसान का निहायत स्वार्थी स्वभाव. अपने परिवार और अपने रिश्तेदारों के अलावा इंसान किसी का भला नहीं देखना चाहता, कभी कभी अपने रिश्तेदारों का भी नहीं. और बाकी बातों से उसे कोई सरोकार नहीं होता. फिर चाहे दुनिया जीए या मरे.
छोड़ भी अब दुनिया की बातें, अपने को क्या करना है!
सुख के दिन और चैन की रातें, अपने को क्या करना है!
... मै क्यूँ सोचूँ मेरा पड़ोसी खाली पेट क्यूँ जाग रहा!
मरे कोई ले खाली आंतें, अपने को क्या करना है!
घर तू जला कर खूब उजाला कर ले जो अँधियारा हो!
मुझ को मिली ढेरों सौगातें, अपने को क्या करना है!
सुन मुफलिस उम्मीदें ना कर प्यार वफ़ा अपनेपन की!
पैसा है तो रिश्ते नाते, अपने को क्या करना है!
तंगहाली ने फिर दिल तोडा, पढी लिखी इक बिटिया का!
बिटियों की लौटें बारातें, अपने को क्या करना है!
संतोष तिवारी
२५/११/२०११
Superb!! अच्छी कोशिश है.
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