Wednesday, November 9, 2011


किसी की याद जब आती है, तो मन व्याकुल हो उठता है. यादों की पीड़ा दर्शाती संतोष तिवारी की एक और कविता:
कुछ नहीं ..... जो है ... बस उसमे सब कुछ है-

बिछड़े उस से अर्सा गुज़ारा , आँखे अब भी भर आती हैं !
साँझ ढले से उसकी यादें , अब भी मेरे घर आती हैं !

आने का ना कोई वादा , मिलने की ना आस कोई ,
फिर भी चौखट पर दो आँखें , आस का दीपक धर आती हैं !

तनहा तनहा रहता हूँ मै ,अपने आप में रहता गुम,
अब तो मेरे दिल की बातें , मुश्किल से लब पर आती हैं !

मेरी दुआ में असर भले ना हो लेकिन करता तो हूँ ,
उनमे जितनी ताकत है वो उतना काम तो कर आती हैं !

मेरे गमो पर हंसने वाले , खूब उड़ा ले आज हंसी ,
लेकिन सोच ले क्या होगा , गर मुसीबतें तुझ पर आती हैं !

- संतोष तिवारी
29/09/2011

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