दोस्तों की कविताओं के साथ चल रहे सफ़र की अगली मंज़िल है अनुभूति सिंह। ये हमारे कवि मित्र हिमांशु की पत्नी हैं, और एक कॉलेज में एसक्यूएल डेटाबेस की प्राध्यापिका. लेकिन कंप्यूटर जैसे विषय को पढ़ाने के बावजूद समय की रेत पर शब्दों की रंगोली बनाना इनका ख़ब्त है. और अपनी सारी व्यस्तताओं के बावजूद ये कविता के लिए समय निकाल ही लेती हैं.बच्चों से लेकर वयस्क, सभी आज असुरक्षाओं से घिरे हैं, और ये असुरक्षा कवयित्री के मन में नित नए सवाल खड़े करती है।
कुछ अनसुलझे सवाल
हर दिन जब 'ककून' से घर के बाहर कदम निकलते हैं
कदम कदम पर अनसुलझे से प्रश्न उमड़ने लगते हैं.
बसते लादे बच्चों के कन्धों पर क्यों कर भार चढ़ा?
... जब हम इतने छोटे थे , क्या हमने कुछ सीखा न पढ़ा?
माना हमसे कहीं अधिक है राह कठिन इनके आगे
पर क्या बीत जाएगा बचपन बिन उछले , कूदे, भागे?
मासूम और, बिन बस्तों के , पर बिन कपड़ों , बिन सपनों के
फैलाएँ हाथ , फटकार सुनें, पर पेट भरें वो अपनों के
मुरझाए, भूखे चेहरों को भी छू जाती है कैसे हँसी?
न जाने क्या क्या उम्मीदें होंगी जीवन से इनकी भी?
भागा दौड़ी इतनी कि बस दो मिनट बचाने के ख़ातिर
क्यों तोड़ क़ायदे दौड़ लगादें पटरी पर , रोएं आख़िर.
कितने ही हादसे होते देखे , फिर भी क्यों न समझ पायें?
रफ़्तार अगर जीने की कुछ कम करें तो शायद जी पायें.
मन दूर रह रहे अपनों से खैरियत जानने को तरसे
हर पल क्यों ये दिल सहमा रहता है अनजाने से डर से?
क्यों कुछ वहशी पूरी दुनिया को धमकाएँ, देहला जाएँ?
और सब मिल कर भी इनके ज़ुल्मों से खुद को न बचा पायें
ऐसे ही बेहिसाब जवाबों की तलाश बस जारी है
या शायद इन उलझनों को सुलझाने की अपनी बारी है.
-- अनुभूति सिंह
हर दिन जब ककून से... वाह क्या अभिव्यक्ति है! बहुत खूब!
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