Wednesday, November 9, 2011


ये हैं मेरी एक और मित्र और हमारी नई कवियित्री अनुराधा पांडे गुरू. संजोग से ये भी नेपानगर मध्यप्रदेश की हैं. इन्होंने अंग्रेज़ी मीडियम में अपना अध्ययन किया, और कई वर्षों से पापुआ न्यू गिनी में रसायनशास्त्र की अ‍ध्यापिका हैं. लेकिन इनका शौक है हिंदी में कविताएं लिखना! है ना अचरज की बात! इनके पति भी यही मानते हैं, और वे इनकी कविताओं के मुरीद भी हैं.


अब आप भी इनकी यह कविता पढ़ें और उस पर अपनी राय दें.

फिर से मिलने के लिए बिछुड़ना ज़रूरी तो नहीं
अबके बिछुड़े तो क्या पता, फिर से मिलें ना कहीं
हर बार उसी राह से गुज़रना ज़रूरी तो नहीं
कौन जाने, इस जीवन का क्या भरोसा है कहीं!

दिल के कोने में कुछ खटकता तो होगा उसके भी,
मिलकर मुझसे, मन और भटकता तो होगा कभी!
चाह कर भी न हटे मन कहीं से तो भला क्या कीजे
रंग दुनिया के सभी .......अपने में रचा बसा लीजे

कौन जाने, इस जीवन का क्या भरोसा है कहीं!
जिंदगी तुझसे कभी हमने कुछ माँगा ही नहीं!

था बहुत भरोसा किसी को, अबके हम न बिछुड़ेंगे
क्या जानते थे तब, हम फिर दोराहों पर चल देंगे?
जुदाई से किसी की, क्यों हो कोई इस तरह दुखी
दोस्त हैं तो मिलना बिछुड़ना ही है तकदीरें सबकी

किसने जाना, जीवन का कोई भरोसा है कहीं?
जिंदगी तुझसे कभी हमने कुछ माँगा ही नहीं!

है गोल यह दुनिया, कोई अंत नहीं है इसका
हो सकता जुदाई हो, जुड़ने का दूसरा सिरा!
इस तरफ दर्द है, उस ओर भी दर्द ही होगा
किसको मिली है ख़ुशी होकर किसी से जुदा?

किसने जाना, जीवन का कोई भरोसा है कहीं?
जिंदगी तुझसे कभी हमने कुछ माँगा ही नहीं!

कई दिलों ने दिए होंगे अब तक कितने इम्तेहान
एक दिल जो हुआ अकेला तो क्यों हों यूं परेशान
बनाती है मधुर सबको, छू लेती है गहरे में कहीं
कोई हकीकत नहीं, सब समझ है अपनी अपनी

किसने जाना, जीवन का कोई भरोसा है कहीं?
जिंदगी तुझसे कभी हमने कुछ माँगा ही नहीं!
अनुराधा 14/10/2011

1 comment:

  1. Thanks Jitendra! Nice intro and good picture!Very well done..........lets keep it going!

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