Thursday, November 10, 2011

बीते कल की यादें समय की चादरों के नीचे जैसे गुम हो जाती हैं, लेकिन एक हवा का झोंका आता है, और उन सारी चादरों को उड़ा कर लेकर जाता है. वक्त का जो फ़ासला बन चुका था, वो मानों था ही नहीं. यही कुछ कहती है अनुराधा की ये नई कविता!



हमारी कहानी ही हमे आज, सुना रहा था कोई
फिर आग पानी में बरबस, लगा रहा था कोई!

छोड़ आये थे हम जो लम्हे, सदियों पहले
उन्हें फिर से आज जिए जा रहा था कोई!

दुनिया की भीड़ में कभी तन्हा छोड़ कर
आज क्यों सहानुभूति जता रहा था कोई!

कोई गम नहीं दशकों गुज़र गए यूंही, पर
जैसे कल का वाकया गुनगुना रहा था कोई

दुखती रगों पर हाथ न रखा करे कोई यूं
बेचैन सा उन्हें फिर समझा रहा था कोई!

क्यों उदास हो उठा यह दिल, एक बार फिर
दरिया में दर्द अपना, यूं डुबा रहा था कोई!

पीछा न छुड़ा पाए परछाइयों से चाहकर भी
उजालों से जाने क्यों मुहं चुरा रहा था कोई!

कह दिया है उनसे ना टकराएँ फिर कहीं भी
पर मिलने की दुआ, किये जा रहा था कोई!

ताउम्र ना ख़त्म हुआ, दुआओं का सिलसिला
तिल तिल कर यूं ही, जला जा रहा था कोई!

हमारे चेहरे पर मुस्कराहट देखकर वे समझे
उनको ख़यालों में अपने, बसा रहा था कोई!

Anuradha Guru

2 comments:

  1. हमारे चेहरे पर मुस्कराहट देखकर वे समझे
    उनको ख़यालों में अपने, बसा रहा था कोई! thanks Jitendra for posting it here. I am sure more people will be able to read it now.

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