Thursday, November 10, 2011

परिंदे का सफ़र.

पूना में पढ़े और मुंबई में कार्यरत दिल्ली के हिमांशु सिंह मेरे बहुत करीबी दोस्त हैं. ये साहब एक आईटी कंपनी में काम करते हैं. बेहद व्यस्त रहते हैं. लेकिन मेरे अनुरोध पर इन्होंने अपनी पुरानी कविता ढूंढ कर निकाली है, और वही अब यहां प्रस्तुत है.





महानगरों में रहे हिमांशु महानगरीय जीवन की आपाधापी भला कैसे भूल सकते हैं! इसी विषय को छूती है इनकी ये रचना.

मैंने परिंदे को देखा घर की तलाश में

तो लगा हर इंसान परिंदे सा

सुबह से शाम क्यों भटकते हैं ये ?
...
अनंत को तलाशते हुए आकाश के खालीपन में

शायद चित्त शांत नहीं

फिर लगा इंसान परिंदे सा

परिंदों का चुगते चुगते सचेत होना

गवाह है उनके भय का

फिर लगा इंसान परिंदे सा

संध्या बीती भोर हुई

फिर वही नित्य कर्म

एक ऊँची उड़ान

सपनो को साकार करने की आशा में

फिर लगा इंसान परिंदे सा


- हिमांशु सिंह

4 comments:

  1. सपनो को साकार करने की आशा में
    फिर लगा इंसान परिंदे सा...........very true Himanshu ji! nice poem.

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  2. उड़ के जाते हुए पंछी ने बस इतना देखा
    देर तक हाथ हिलाती रही वो शाख फिजां में
    अलविदा कहती थी या पास बुलाती थी उसे !
    -- गुलज़ार
    very nice himanshu ji

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  3. वाह वाह क्या बात है! वाकई बहुत सुंदर कविता है!

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  4. Its a nice poem. Please write more.

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